📿 श्लोक संग्रह

चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टम्

गीता 4.13 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 4 — ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः ।
तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम् ॥
चातुर्वर्ण्यम्
चार वर्णों की व्यवस्था
मया
मेरे द्वारा
सृष्टम्
रची गई
गुणकर्मविभागशः
गुण और कर्म के विभाग से
तस्य
उसका
कर्तारम्
करने वाला
अपि
होते हुए भी
माम्
मुझे
विद्धि
जानो
अकर्तारम्
अकर्ता, न करने वाला
अव्ययम्
अविनाशी

कृष्ण कहते हैं कि चार वर्णों की व्यवस्था उन्होंने गुण और कर्म के आधार पर की — जन्म के आधार पर नहीं। जैसे किसी परिवार में कोई खेती करता है, कोई व्यापार, कोई पढ़ाता है — हर कोई अपने स्वभाव और काम से अलग होता है। यह विभाजन प्रकृति का है।

इसके साथ एक गहरी बात भी है — कृष्ण कहते हैं कि मैं इस रचना का कर्ता होते हुए भी अकर्ता हूँ। जैसे वर्षा होती है लेकिन आकाश गीला नहीं होता — ईश्वर सृष्टि करता है लेकिन उसमें बंधता नहीं।

यह श्लोक गीता के उन श्लोकों में है जिन्हें परम्परा में सामाजिक व्यवस्था के सन्दर्भ में उद्धृत किया जाता रहा है। गुण और कर्म — ये दो आधार हैं, जन्म नहीं।

अगला श्लोक (4.14) इसी के आगे बताता है कि कर्म कृष्ण को क्यों नहीं बाँधते।

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