यज्ञ-चक्र की व्याख्या के बाद कृष्ण कहते हैं — जो इस चक्र का पालन नहीं करता, वह व्यर्थ जीता है। 'अघायुः' — पाप से भरा जीवन। 'इंद्रियाराम' — जो केवल इंद्रियों के सुख में डूबा रहता है।
यह कड़ी बात है — पर सत्य है। जब मनुष्य केवल अपने लिए जीता है, समाज और प्रकृति का ऋण नहीं चुकाता, तो उसका जीवन अर्थहीन हो जाता है।