📿 श्लोक संग्रह

इन्द्रियाणां हि चरतां

गीता 2.67 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 2 — सांख्ययोग
इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते ।
तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि ॥
इन्द्रियाणाम्
इंद्रियों में से
हि
निश्चय ही
चरताम्
विचरण करती हुई
यत्
जिसके
मनः
मन
अनुविधीयते
पीछे चल पड़ता है
तत्
वह
अस्य
इसकी
हरति
हर लेती है
प्रज्ञाम्
बुद्धि को
वायुः
वायु
नावम् इव
नाव की तरह
अम्भसि
जल में

कृष्ण एक सुंदर उपमा देते हैं — जैसे तेज़ हवा पानी में नाव को उड़ाकर ले जाती है, वैसे ही जब मन किसी एक इंद्रिय के पीछे चल पड़ता है, तो वह बुद्धि को हर लेता है।

यह रोज़मर्रा के जीवन में दिखता है — जब कोई स्वादिष्ट भोजन की ख़ुशबू आती है और मन उसके पीछे चल पड़ता है, तो व्यक्ति अपना डायट का निश्चय भूल जाता है। मन ने बुद्धि को 'हर' लिया।

नाव की उपमा बहुत सटीक है — नाव चाहे कितनी भी मज़बूत हो, तेज़ हवा उसे अपनी दिशा में मोड़ देती है। वैसे ही बुद्धि चाहे कितनी भी तीक्ष्ण हो, अनियंत्रित मन उसे भटका देता है।

यह श्लोक इंद्रिय-संयम के महत्व पर ज़ोर देता है। 2.62-63 में कृष्ण ने बताया था कि विषयों का चिंतन कैसे क्रमशः पतन की ओर ले जाता है — 2.67 में वही बात उपमा से समझाई गई है।

गीता 6.34 (चञ्चलं हि मनः कृष्ण) में अर्जुन स्वयं कहते हैं कि मन को वश में करना वायु को रोकने जैसा कठिन है।

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