📿 श्लोक संग्रह

नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य

गीता 2.66 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 2 — सांख्ययोग
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना ।
न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम् ॥
नास्ति बुद्धिः
बुद्धि नहीं
अयुक्तस्य
अयुक्त के लिए (जो योग में नहीं)
न च भावना
न ध्यान-भावना
अयुक्तस्य
अयुक्त के लिए
अभावयतः
ध्यान न करने वाले का
शान्तिः नास्ति
शांति नहीं
अशान्तस्य
अशांत के लिए
कुतः सुखम्
सुख कहाँ से

कृष्ण एक अद्भुत कारण-कार्य श्रृंखला बताते हैं — जो योग में नहीं है, उसके पास बुद्धि नहीं; जो योग में नहीं, उसके पास भावना (ध्यान) नहीं; जो ध्यान नहीं करता, उसे शांति नहीं; और जो अशांत है, उसे सुख कहाँ से मिलेगा?

यह श्लोक उलटा पढ़ने पर भी उतना ही गहरा है। सुख के लिए शांति चाहिए, शांति के लिए ध्यान, ध्यान के लिए बुद्धि, और बुद्धि के लिए योग। यह पूरा रास्ता एक साथ जुड़ा है।

भगवद्गीता में यह श्लोक 2.65 के प्रसाद-बुद्धि के विचार का पूरक है। वहाँ सकारात्मक क्रम बताया, यहाँ नकारात्मक क्रम — क्या होता है जब योग नहीं है।

'अयुक्त' — जो योग में नहीं है — यह केवल ध्यान न करने वाला नहीं, बल्कि जिसका मन बिखरा हुआ है।

अध्याय 2 · 66 / 72
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