कृष्ण कहते हैं — प्रसन्नता में उसके सब दुःखों का नाश होता है। और प्रसन्न चित्त वाले की बुद्धि शीघ्र स्थिर हो जाती है। यह 2.64 के बाद आता है जहाँ बताया था कि आसक्ति-द्वेष से रहित इंद्रियों से विषयों में विचरने वाले का चित्त प्रसाद को पाता है।
यह श्लोक एक अद्भुत क्रम बताता है — इंद्रिय-संयम से प्रसाद (मानसिक शांति) आती है, प्रसाद से दुःख जाते हैं, और दुःख जाने पर बुद्धि स्थिर होती है। यह एक स्वाभाविक श्रृंखला है।