📿 श्लोक संग्रह

प्रसादे सर्वदुःखानाम्

गीता 2.65 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 2 — सांख्ययोग
प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते ।
प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते ॥
प्रसादे
प्रसन्नता में, चित्त की प्रसन्नता से
सर्वदुःखानाम् हानिः
सब दुःखों का नाश
अस्य
इसके (प्रसन्नचित्त के)
उपजायते
होता है
प्रसन्नचेतसः
प्रसन्न चित्त वाले की
आशु
शीघ्र
बुद्धिः पर्यवतिष्ठते
बुद्धि स्थिर हो जाती है

कृष्ण कहते हैं — प्रसन्नता में उसके सब दुःखों का नाश होता है। और प्रसन्न चित्त वाले की बुद्धि शीघ्र स्थिर हो जाती है। यह 2.64 के बाद आता है जहाँ बताया था कि आसक्ति-द्वेष से रहित इंद्रियों से विषयों में विचरने वाले का चित्त प्रसाद को पाता है।

यह श्लोक एक अद्भुत क्रम बताता है — इंद्रिय-संयम से प्रसाद (मानसिक शांति) आती है, प्रसाद से दुःख जाते हैं, और दुःख जाने पर बुद्धि स्थिर होती है। यह एक स्वाभाविक श्रृंखला है।

भगवद्गीता में 2.62–2.65 एक कारण-कार्य श्रृंखला बनाते हैं। विषय-चिंतन से आसक्ति, आसक्ति से काम, काम से क्रोध... और उलटे क्रम में इंद्रिय-संयम से प्रसाद, प्रसाद से शांति।

'प्रसाद' शब्द का अर्थ केवल प्रसाद (भोजन) नहीं — यहाँ इसका अर्थ है मानसिक प्रसन्नता, निर्मलता, और शांति।

अध्याय 2 · 65 / 72
अध्याय 2 · 65 / 72 अगला →