📿 श्लोक संग्रह

तानि सर्वाणि संयम्य

गीता 2.61 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 2 — सांख्ययोग
तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः ।
वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥
तानि सर्वाणि
उन सब को
संयम्य
संयमित करके
युक्तः
योगयुक्त होकर
आसीत
बैठे
मत्परः
मुझे परम मानते हुए
वशे
वश में
यस्य इन्द्रियाणि
जिसकी इंद्रियाँ
तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता
उसकी प्रज्ञा स्थिर है

कृष्ण कहते हैं — उन सब इंद्रियों को संयमित करके, मुझे परम लक्ष्य मानते हुए, योगयुक्त होकर बैठो। जिसकी इंद्रियाँ वश में हैं, उसकी प्रज्ञा स्थिर है। यहाँ कृष्ण उपाय बताते हैं — अपनी शक्ति से इंद्रियाँ काबू करना कठिन है, मुझ (परमात्मा) में मन लगाओ।

यह भक्तियोग का सार है। जब मन किसी उच्च लक्ष्य में लगा हो, तो वह छोटे-छोटे विषयों में नहीं भटकता। जैसे एक बच्चा जब अपनी मनपसंद किताब में डूबा हो तो बाहर की आवाज़ें कम सुनाई देती हैं।

भगवद्गीता में 2.60 में इंद्रियों की शक्ति बताई, 2.61 में समाधान — परमात्मा में मन लगाना। यह क्रम बहुत महत्वपूर्ण है।

'मत्परः' — मुझे परम मानना — यह भक्ति और ज्ञान दोनों का मेल है। ज्ञान के बिना भक्ति अंधी हो सकती है और भक्ति के बिना ज्ञान शुष्क।

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