📿 श्लोक संग्रह

विषया विनिवर्तन्ते

गीता 2.59 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 2 — सांख्ययोग
विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः ।
रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते ॥
विषयाः
विषय (भोग की वस्तुएँ)
विनिवर्तन्ते
लौट जाते हैं
निराहारस्य
उपवास करने वाले (इंद्रियों को रोकने वाले)
देहिनः
शरीरधारी के
रसवर्जम्
रस (स्वाद/आसक्ति) को छोड़कर
रसः अपि
रस भी
अस्य
इसका
परम् दृष्ट्वा
परम तत्व को देखकर
निवर्तते
लौट जाता है

कृष्ण एक बहुत गहरी बात कहते हैं — जो व्यक्ति इंद्रियों को ज़बरदस्ती रोकता है, उसके विषय (बाहरी भोग) तो रुक जाते हैं, लेकिन भीतर का रस (आसक्ति, स्वाद) नहीं रुकता। वह रस तब रुकता है जब व्यक्ति परम तत्व का दर्शन करता है।

यह बिलकुल सच्ची बात है — डायटिंग करने वाला व्यक्ति मिठाई नहीं खाता, लेकिन मिठाई देखकर मन में इच्छा तो उठती है। बाहर से रोकना आसान है, भीतर से छूटना कठिन। लेकिन जब कोई बड़ा आनंद मिल जाए, तो छोटे आनंद अपने आप छूट जाते हैं।

जैसे जो बच्चा कंचे खेलता था, जब उसे क्रिकेट खेलने का मौक़ा मिलता है तो कंचे अपने आप छूट जाते हैं — बड़ा आनंद मिलने पर छोटा आनंद तुच्छ लगने लगता है।

यह श्लोक केवल बलपूर्वक इंद्रिय-निग्रह की सीमा बताता है। गीता का मार्ग दमन का नहीं, रूपांतरण का है — जब भीतर से बदलाव आए, तभी सच्चा वैराग्य है।

इसी विचार को आगे 2.60-61 में और विस्तार से बताया गया है।

अध्याय 2 · 59 / 72
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