📿 श्लोक संग्रह

श्रुतिविप्रतिपन्ना ते

गीता 2.53 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 2 — सांख्ययोग
श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला ।
समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि ॥
श्रुतिविप्रतिपन्ना
श्रुति (वेद-वचनों) से भटकी हुई
ते बुद्धिः
तुम्हारी बुद्धि
यदा
जब
स्थास्यति निश्चला
निश्चल होकर खड़ी रहेगी
समाधौ अचला
समाधि में अडिग
तदा
तब
योगम् अवाप्स्यसि
योग को प्राप्त होगे

कृष्ण अर्जुन को बताते हैं — जब तुम्हारी बुद्धि, जो अभी अनेक वेद-वचनों से विचलित होती रहती है, समाधि में अडिग और निश्चल हो जाएगी — तब तुम योग को प्राप्त होगे। यह योग की परिभाषा है।

जब कोई भी बाहरी वचन या तर्क बुद्धि को डिगा न सके — वह अवस्था है स्थिर-प्रज्ञता। यह कोई ज़िद्द नहीं है। यह वह दृढ़ता है जो गहरे अनुभव से आती है।

भगवद्गीता में 2.52–2.53 एक क्रम बनाते हैं। 2.52 में मोह का दलदल पार होने की बात है, 2.53 में उसके बाद की स्थिति — बुद्धि की अडिगता — बताई गई है।

यहाँ 'श्रुति' का अर्थ वेद-वचन है जो कभी-कभी अलग-अलग फल देने का वचन देते हैं — जिससे मन भ्रमित होता है। ज्ञान होने पर यह भ्रम दूर होता है।

अध्याय 2 · 53 / 72
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