📿 श्लोक संग्रह

व्यवसायात्मिका बुद्धिः

गीता 2.41 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 2 — सांख्ययोग
व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन ।
बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् ॥
व्यवसायात्मिका
निश्चयात्मक
बुद्धिः
बुद्धि
एका
एक
इह
यहाँ (इस मार्ग में)
कुरुनन्दन
हे कुरुनन्दन (अर्जुन)
बहुशाखाः
बहुत शाखाओं वाली
अनन्ताः
अनंत
बुद्धयः
बुद्धियाँ
अव्यवसायिनाम्
अनिश्चित लोगों की

कृष्ण कहते हैं कि जो निश्चय कर लेता है, उसकी बुद्धि एक दिशा में केंद्रित हो जाती है। लेकिन जो अनिश्चित है, उसकी बुद्धि अनेक शाखाओं में बँट जाती है — यह करूँ, वह करूँ, यह ठीक है, वह ठीक है।

जैसे एक नदी जब सीधी बहती है तो गहरी और शक्तिशाली होती है। लेकिन जब वह अनेक धाराओं में बँट जाती है, तो हर धारा उथली और कमज़ोर हो जाती है। वैसे ही बुद्धि जब एक लक्ष्य पर टिकती है तो शक्तिशाली होती है।

यह शिक्षा आज भी उतनी ही प्रासंगिक है — जो विद्यार्थी एक विषय पर ध्यान लगाता है, वह सफल होता है। जो इधर-उधर भटकता रहता है, वह कहीं नहीं पहुँचता।

यह श्लोक बुद्धियोग (बुद्धि का अनुशासन) की शुरुआत करता है। कृष्ण बता रहे हैं कि कर्मयोग के लिए पहली शर्त है — निश्चय।

आगे 2.42-44 में कृष्ण उन लोगों का वर्णन करते हैं जो वेदों के फूलदार वचनों में उलझ जाते हैं — उनकी बुद्धि बहुशाखा है।

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