📿 श्लोक संग्रह

नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति

गीता 2.40 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 2 — सांख्ययोग
नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते ।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥
न इह
इसमें नहीं
अभिक्रमनाशः
आरंभ का नाश
अस्ति
है
प्रत्यवायः
दोष, विपरीत फल
न विद्यते
नहीं है
स्वल्पम् अपि
थोड़ा भी
अस्य धर्मस्य
इस धर्म (कर्मयोग) का
त्रायते
बचाता है
महतः भयात्
बड़े भय से

कृष्ण एक बहुत प्रोत्साहन देने वाली बात कहते हैं — इस कर्मयोग के मार्ग पर जो भी प्रयत्न किया जाए, वह कभी व्यर्थ नहीं जाता। आधा छोड़ देने पर भी कोई दोष नहीं लगता।

जैसे बैंक में जमा किया हुआ पैसा कभी खोता नहीं — चाहे आप थोड़ा जमा करें या बहुत — वैसे ही कर्मयोग में किया गया हर छोटा प्रयत्न संचित होता रहता है।

और सबसे सुंदर बात — इस धर्म का थोड़ा-सा भी पालन बड़े-बड़े भयों से रक्षा करता है। एक दीपक की छोटी-सी लौ भी अंधेरे भरे कमरे को प्रकाशित कर देती है।

यह श्लोक उन लोगों के लिए विशेष प्रेरणा है जो सोचते हैं कि आध्यात्मिक मार्ग बहुत कठिन है। कृष्ण कह रहे हैं — छोटा प्रयत्न भी मूल्यवान है।

गीता 6.40 में भी कृष्ण कहते हैं कि योग में प्रयत्न करने वाला कभी नष्ट नहीं होता — न इहलोक में, न परलोक में।

अध्याय 2 · 40 / 72
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