कृष्ण दूसरा पक्ष रखते हैं — यदि तुम इस धर्म-युद्ध को नहीं करोगे, तो अपना धर्म और कीर्ति दोनों खोकर पाप के भागीदार बनोगे। यह 2.32 का उलटा तर्क है — पहले बताया कि युद्ध करने से क्या मिलेगा, अब बताते हैं कि न करने से क्या जाएगा।
यह कोई डर या धमकी नहीं है। यह एक यथार्थ विश्लेषण है। जब कोई अपना कर्तव्य जानते हुए भी उससे मुँह फेर लेता है, तो उसके भीतर भी वह कमी रहती है — यही पाप है।