📿 श्लोक संग्रह

अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यम्

गीता 2.33 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 2 — सांख्ययोग
अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं सङ्ग्रामं न करिष्यसि ।
ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि ॥
अथ चेत्
यदि किंतु
इमम् धर्म्यम्
इस धर्म-युद्ध को
सङ्ग्रामम्
संग्राम
न करिष्यसि
नहीं करोगे
ततः
तब
स्वधर्मम्
अपना धर्म
कीर्तिम्
यश, कीर्ति
हित्वा
छोड़कर
पापम् अवाप्स्यसि
पाप पाओगे

कृष्ण दूसरा पक्ष रखते हैं — यदि तुम इस धर्म-युद्ध को नहीं करोगे, तो अपना धर्म और कीर्ति दोनों खोकर पाप के भागीदार बनोगे। यह 2.32 का उलटा तर्क है — पहले बताया कि युद्ध करने से क्या मिलेगा, अब बताते हैं कि न करने से क्या जाएगा।

यह कोई डर या धमकी नहीं है। यह एक यथार्थ विश्लेषण है। जब कोई अपना कर्तव्य जानते हुए भी उससे मुँह फेर लेता है, तो उसके भीतर भी वह कमी रहती है — यही पाप है।

भगवद्गीता के अनुसार यहाँ 'धर्म्यम् सङ्ग्रामम्' — धर्म के अनुरूप युद्ध — शब्द महत्वपूर्ण है। यह केवल कोई युद्ध नहीं, बल्कि धर्म की रक्षा के लिए किया जाने वाला युद्ध है।

स्वधर्म और कीर्ति — दोनों का एक साथ उल्लेख बताता है कि धर्म का पालन न करने पर आंतरिक और बाहरी दोनों हानि होती है।

अध्याय 2 · 33 / 72
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