📿 श्लोक संग्रह

स्वधर्ममपि चावेक्ष्य

गीता 2.31 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 2 — सांख्ययोग
स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि ।
धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते ॥
स्वधर्मम्
अपने धर्म (कर्तव्य) को
अपि च
भी
अवेक्ष्य
देखते हुए
न विकम्पितुम् अर्हसि
डगमगाना उचित नहीं
धर्म्यात्
धर्मयुक्त
युद्धात्
युद्ध से
श्रेयः
श्रेष्ठ
अन्यत्
दूसरा
क्षत्रियस्य
क्षत्रिय के लिए
न विद्यते
नहीं है

कृष्ण अब आत्मा के दर्शन से स्वधर्म (कर्तव्य) की बात पर आते हैं। वे कहते हैं — अपने कर्तव्य को देखते हुए भी तुम्हें डगमगाना नहीं चाहिए। एक क्षत्रिय के लिए धर्मयुक्त युद्ध से बढ़कर कोई कर्तव्य नहीं है।

हर व्यक्ति का अपना कर्तव्य होता है — शिक्षक का कर्तव्य पढ़ाना है, डॉक्टर का इलाज करना, किसान का खेती। अर्जुन एक योद्धा हैं — उनका कर्तव्य अन्याय के विरुद्ध लड़ना है।

कृष्ण यह नहीं कह रहे कि हिंसा अच्छी है। वे कह रहे हैं कि जब अन्याय सामने हो और आपका कर्तव्य उसका विरोध करना हो, तो पीछे हटना उचित नहीं।

यहाँ कृष्ण ने दो तर्क एक साथ दिए हैं — एक आध्यात्मिक (आत्मा अमर है) और एक व्यावहारिक (स्वधर्म का पालन करो)। यह गीता की विशेषता है — वह केवल दर्शन नहीं, कर्म का भी मार्गदर्शन करती है।

गीता 3.35 (स्वधर्मे निधनं श्रेयः) में इसी विचार को और आगे बढ़ाया गया है।

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