📿 श्लोक संग्रह

जातस्य हि ध्रुवो मृत्युः

गीता 2.27 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 2 — सांख्ययोग
जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च ।
तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ॥
जातस्य
जन्म लेने वाले की
हि
निश्चय ही
ध्रुवः
निश्चित है
मृत्युः
मृत्यु
ध्रुवम्
निश्चित है
जन्म
जन्म
मृतस्य
मरे हुए का
तस्मात्
इसलिए
अपरिहार्ये अर्थे
जो टाला न जा सके, उस विषय में
न शोचितुम् अर्हसि
शोक करना उचित नहीं

कृष्ण कहते हैं — जो जन्मा है उसकी मृत्यु निश्चित है, और जो मरा है उसका जन्म भी निश्चित है। जो बात टाली ही नहीं जा सकती, उसके लिए शोक करना व्यर्थ है।

यह जीवन का सबसे बड़ा सत्य है — जन्म और मृत्यु एक चक्र है। जैसे दिन के बाद रात आती है और रात के बाद फिर दिन — वैसे ही जन्म के बाद मृत्यु है और मृत्यु के बाद फिर जन्म।

कृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं — जो अपरिहार्य है, जिसे कोई रोक नहीं सकता, उसके लिए शोक करना बुद्धिमानी नहीं है। अपना कर्तव्य करो।

यह श्लोक जन्म-मृत्यु के चक्र को स्वीकार करने की शिक्षा देता है। कृष्ण यहाँ व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाते हैं — दार्शनिक सत्य के साथ-साथ कर्तव्य की याद भी दिलाते हैं।

इस श्लोक के बाद कृष्ण धीरे-धीरे कर्मयोग की ओर बढ़ते हैं — आत्मा अमर है, शरीर नश्वर है, तो कर्तव्य से पीछे क्यों हटना?

अध्याय 2 · 27 / 72
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