📿 श्लोक संग्रह

कार्यमित्येव यत्

गीता 18.9 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 18 — मोक्षसंन्यासयोग
कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन ।
सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः ॥
कार्यम् इति एव
यह करना ही है — कर्तव्य है
नियतम्
नियत — निश्चित कर्तव्य
क्रियते
किया जाता है
सङ्गम् त्यक्त्वा
आसक्ति छोड़ कर
फलम् च एव
और फल को भी
सात्त्विकः
सात्त्विक — सत्त्वगुण से युक्त

भगवान कहते हैं — जो व्यक्ति यह सोचकर कर्म करता है कि 'यह मेरा कर्तव्य है, इसे करना ही है' — और आसक्ति तथा फल की चाह छोड़ देता है — वह सात्त्विक त्याग करता है।

सात्त्विक त्याग का सौंदर्य यह है — कर्म करते भी हो, और मुक्त भी होते हो। काम बंद नहीं होता, पर भीतर से बंधन खत्म हो जाता है। यही गीता का 'योग' है।

तीन त्यागों में सात्त्विक त्याग सर्वोत्तम है। यह कर्म-त्याग नहीं, बल्कि आसक्ति का त्याग है — और यही मुक्ति का मार्ग है।

यह श्लोक गीता की मूल शिक्षा का केंद्र है। 'कार्यम् इति' — यह करना है, बस — इसी भाव से किया गया कर्म बंधन नहीं बनता।

अध्याय 18 · 9 / 78
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