यह गीता का अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण उपदेश माना जाता रहा है। भगवान कृष्ण कहते हैं — सब चिंता, सब उलझन छोड़कर बस मेरी शरण में आ जाओ। मैं तुम्हें सब बंधनों से मुक्त कर दूँगा। चिंता मत करो।
इसे ऐसे समझो — जब एक छोटा बच्चा बहुत परेशान हो जाता है, रोने लगता है, तो दादी कहती हैं — 'बस, सब छोड़, मेरे पास आ जा, मैं सँभाल लूँगी।' भगवान भी यही कह रहे हैं। यह शरणागति का सबसे सरल संदेश है।
इस श्लोक में 'मा शुचः' — शोक मत करो — ये दो शब्द बहुत महत्वपूर्ण हैं। गीता की शुरुआत अर्जुन के शोक से हुई थी और अंत में भगवान कहते हैं — अब शोक करने की कोई बात नहीं रही। यही गीता की पूरी यात्रा है — शोक से शांति तक।