📿 श्लोक संग्रह

ईश्वरः सर्वभूतानाम्

गीता 18.61 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 18 — मोक्षसंन्यासयोग
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥
ईश्वरः
ईश्वर — परमात्मा
सर्वभूतानाम्
सब प्राणियों के
हृद्देशे
हृदय-प्रदेश में
तिष्ठति
निवास करता है — रहता है
भ्रामयन्
घुमाते हुए — चलाते हुए
यन्त्रारूढानि
यंत्र पर आरूढ़ — यंत्र जैसे शरीर में बैठे
मायया
माया से

भगवान कहते हैं — हे अर्जुन, ईश्वर सब प्राणियों के हृदय में रहता है। वह माया के द्वारा सब प्राणियों को यंत्र पर आरूढ़ की तरह घुमाता है।

यंत्र की उपमा बहुत सटीक है। शरीर एक यंत्र है — और इसमें ईश्वर चालक की तरह बैठा है। हम स्वयं को स्वतंत्र समझते हैं, पर भीतर से ईश्वर ही संचालित करता है।

यह श्लोक उपनिषदों के 'अंतर्यामी' — भीतरी नियंता — की अवधारणा से जुड़ता है। ईश्वर हृदय में है — बाहर खोजने की जरूरत नहीं।

'माया' यहाँ बुरे अर्थ में नहीं — यह ईश्वर की रचना-शक्ति है। इसी से वह जगत चलाता है।

अध्याय 18 · 61 / 78
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