📿 श्लोक संग्रह

विविक्तसेवी लघ्वाशी

गीता 18.52 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 18 — मोक्षसंन्यासयोग
विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः ।
ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः ॥
विविक्तसेवी
एकांत स्थान में रहने वाला
लघ्वाशी
अल्प भोजन करने वाला
यतवाक्कायमानसः
वाणी-शरीर-मन को संयत करने वाला
ध्यानयोगपरः
ध्यानयोग में लगा हुआ
नित्यम्
सदा — हमेशा
वैराग्यम् समुपाश्रितः
वैराग्य का आश्रय लिया हुआ

साधना के अगले चरण — एकांत में रहना, कम खाना, वाणी-शरीर-मन तीनों को संयत रखना, ध्यानयोग में सदा लगे रहना, और वैराग्य का आश्रय लेना।

ये व्यावहारिक साधनाएँ हैं। एकांत और अल्पाहार — ये भीतर की शांति के लिए जरूरी हैं। वाणी-संयम — बेकार बोलना बंद — यह ऊर्जा बचाता है।

यह श्लोक बाहरी जीवन-शैली की साधना है — जो 18.51 की आंतरिक साधना के साथ चलती है। दोनों साथ होने पर ही पूर्ण साधना बनती है।

'वैराग्यं समुपाश्रितः' — वैराग्य का सहारा लेना। वैराग्य भागना नहीं, बल्कि अतिरिक्त आसक्ति छोड़ना है।

अध्याय 18 · 52 / 78
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