📿 श्लोक संग्रह

यदग्रे चानुबन्धे च

गीता 18.39 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 18 — मोक्षसंन्यासयोग
यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः ।
निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम् ॥
अग्रे च अनुबन्धे च
पहले और बाद में भी
मोहनम् आत्मनः
आत्मा को मोहित करने वाला
निद्रालस्यप्रमादोत्थम्
नींद, आलस और प्रमाद से उत्पन्न
तामसम्
तामस
उदाहृतम्
कहा गया है

तामस सुख वह है जो पहले भी आत्मा को मोहित करे और अंत में भी। यह नींद, आलस और प्रमाद से उत्पन्न होता है। इसमें न आरंभ में कोई उन्नति है, न अंत में।

बहुत अधिक सोना, बेकार बैठे रहना, जीवन के प्रति उदासीन रहना — इससे जो 'आराम' मिलता है, वह तामस सुख है। यह आनंद नहीं, जड़ता है।

तीन सुखों में तामस सबसे हानिकारक है — क्योंकि यह पहले और बाद — दोनों में मोह में डालता है। कम से कम राजस सुख में आरंभ का आनंद था।

सुख के तीन प्रकारों की श्रृंखला यहाँ समाप्त होती है। अगला श्लोक (18.40) गुण-विवेचन का समापन करेगा।

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