सात्त्विक कर्ता में चार गुण होते हैं — आसक्ति नहीं, अहंकार नहीं, धृति (दृढ़ता) और उत्साह हैं, और सफलता-असफलता दोनों में वह एक जैसा रहता है।
यह चित्र बहुत सुंदर है। जो काम करता है पर 'मैंने किया' नहीं कहता, जो जीतने पर फूलता नहीं और हारने पर टूटता नहीं — वह सात्त्विक कर्ता है।