📿 श्लोक संग्रह

मुक्तसङ्गोऽनहंवादी

गीता 18.26 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 18 — मोक्षसंन्यासयोग
मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः ।
सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते ॥
मुक्तसङ्गः
आसक्ति से मुक्त
अनहंवादी
'मैं' न कहने वाला — अहंकार-रहित
धृत्युत्साहसमन्वितः
धृति और उत्साह से युक्त
सिद्ध्यसिद्ध्योः
सफलता और असफलता में
निर्विकारः
विकार-रहित — अविचलित
सात्त्विकः
सात्त्विक कर्ता

सात्त्विक कर्ता में चार गुण होते हैं — आसक्ति नहीं, अहंकार नहीं, धृति (दृढ़ता) और उत्साह हैं, और सफलता-असफलता दोनों में वह एक जैसा रहता है।

यह चित्र बहुत सुंदर है। जो काम करता है पर 'मैंने किया' नहीं कहता, जो जीतने पर फूलता नहीं और हारने पर टूटता नहीं — वह सात्त्विक कर्ता है।

'धृति और उत्साह' — ये दोनों साथ हैं। सात्त्विक कर्ता सुस्त नहीं, पर आसक्त भी नहीं। यह संतुलन ही उसकी पहचान है।

यह श्लोक गीता के दूसरे अध्याय के 'स्थितप्रज्ञ' का व्यावहारिक रूप है — काम में उतरा हुआ, पर भीतर से मुक्त।

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