तामस कर्म वह है जो मोह में उठाया जाए — बिना यह सोचे कि इसका परिणाम क्या होगा, किसी की हानि तो नहीं होगी, और क्या मुझमें इसे करने की शक्ति है या नहीं।
तामस कर्म में विवेक नहीं होता। बस आवेग होता है — 'करना है, बस।' ऐसे कर्म अक्सर स्वयं को और दूसरों को नुकसान पहुँचाते हैं।