📿 श्लोक संग्रह

अनुबन्धं क्षयं हिंसाम्

गीता 18.25 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 18 — मोक्षसंन्यासयोग
अनुबन्धं क्षयं हिंसामनवेक्ष्य च पौरुषम् ।
मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते ॥
अनुबन्धम्
परिणाम — बंधन
क्षयम्
हानि — नाश
हिंसाम्
हिंसा
अनवेक्ष्य
ध्यान न देकर — बिना विचारे
पौरुषम्
अपनी शक्ति — सामर्थ्य
मोहात्
मोह से — भ्रम से
आरभ्यते
आरंभ किया जाता है
तामसम्
तामस — तमोगुण से युक्त

तामस कर्म वह है जो मोह में उठाया जाए — बिना यह सोचे कि इसका परिणाम क्या होगा, किसी की हानि तो नहीं होगी, और क्या मुझमें इसे करने की शक्ति है या नहीं।

तामस कर्म में विवेक नहीं होता। बस आवेग होता है — 'करना है, बस।' ऐसे कर्म अक्सर स्वयं को और दूसरों को नुकसान पहुँचाते हैं।

तामस कर्म में तीन अनदेखी हैं — परिणाम की, हानि की, और अपनी शक्ति की। यह तीनों मिलकर सबसे खतरनाक कर्म बनाते हैं।

कर्म की यह तीन-श्रेणी पूरी होती है यहाँ। अगले श्लोकों में कर्ता की तीन श्रेणियाँ आएंगी।

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