📿 श्लोक संग्रह

यस्य नाहंकृतो भावः

गीता 18.17 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 18 — मोक्षसंन्यासयोग
यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते ।
हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते ॥
यस्य
जिसके
न अहंकृतः भावः
अहंकार का भाव नहीं
बुद्धिः न लिप्यते
बुद्धि लिप्त नहीं होती — आसक्त नहीं होती
हत्वा अपि
मारकर भी
इमान् लोकान्
इन सब लोगों को
न हन्ति
नहीं मारता — पाप का भागी नहीं
न निबध्यते
बंधन में नहीं पड़ता

यह श्लोक गीता के सबसे गहरे कथनों में से एक है। भगवान कहते हैं — जिसके मन में अहंकार नहीं, जिसकी बुद्धि कर्म में लिप्त नहीं होती — वह इन सबको मारकर भी वास्तव में न मारता है, न बंधता है।

यह अर्जुन के लिए विशेष संदेश है — युद्ध में शस्त्र उठाना पड़ेगा, पर यदि भाव शुद्ध है, अहंकार नहीं है — तो यह कर्म पाप नहीं बनता। कर्ता का भाव ही बंधन का कारण है।

यह श्लोक गीता के दूसरे अध्याय की 'स्थितप्रज्ञ' की शिक्षा और तीसरे अध्याय की 'निष्काम कर्म' की शिक्षा का मिलन-बिंदु है।

यहाँ 'न हन्ति' का अर्थ — वह कर्म तो करता है, पर उसका अभिमान नहीं। इसीलिए वह कर्म-फल का भागी नहीं बनता।

अध्याय 18 · 17 / 78
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