📿 श्लोक संग्रह

न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म

गीता 18.10 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 18 — मोक्षसंन्यासयोग
न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते ।
त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः ॥
न द्वेष्टि
द्वेष नहीं करता — घृणा नहीं करता
अकुशलम्
अशुभ — कठिन कर्म
कुशले
शुभ कर्म में
न अनुषज्जते
आसक्त नहीं होता
सत्त्वसमाविष्टः
सत्त्वगुण से परिपूर्ण
मेधावी
बुद्धिमान — प्रज्ञावान
छिन्नसंशयः
संशय से मुक्त — निःसंदेह

सात्त्विक त्यागी कैसा होता है? भगवान कहते हैं — वह न तो कठिन कर्म से डरता है, न आसान-सुखद कर्म से चिपकता है। वह सत्त्वगुण से भरा, बुद्धिमान और संशय-रहित होता है।

यह एक शांत, स्थिर मनुष्य का चित्र है। उसे न ऊँचाई का अभिमान होता है, न नीचाई का दुःख। हर परिस्थिति में वह एक जैसा रहता है — यही सात्त्विक त्यागी का लक्षण है।

यह श्लोक 'स्थितप्रज्ञ' (गीता 2.54-72) के उस वर्णन का अठारहवें अध्याय में प्रतिध्वनि है। स्थिर बुद्धि वाला व्यक्ति ही सच्चा त्यागी है।

भगवान ने यहाँ 'छिन्नसंशयः' कहा है — संशय टूट जाना। जब भीतर से संदेह खत्म होता है, तभी असली स्थिरता आती है।

अध्याय 18 · 10 / 78
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