📿 श्लोक संग्रह

संन्यासस्य महाबाहो

गीता 18.1 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 18 — मोक्षसंन्यासयोग
संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् ।
त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन ॥
संन्यासस्य
संन्यास का — सब छोड़ने का
तत्त्वम्
सच्चाई — असली स्वरूप
इच्छामि वेदितुम्
जानना चाहता हूँ
त्यागस्य
त्याग का — छोड़ने का
पृथक्
अलग-अलग — भिन्न रूप से
हृषीकेश
इंद्रियों के स्वामी — कृष्ण
केशिनिषूदन
केशी दैत्य का वध करने वाले — कृष्ण

गीता का अठारहवाँ अध्याय शुरू होता है अर्जुन के एक सीधे प्रश्न से। वे भगवान से पूछते हैं — संन्यास और त्याग, ये दोनों क्या हैं? दोनों का सत्य मुझे अलग-अलग बताइए। यह प्रश्न पूरे अंतिम अध्याय की नींव है।

अर्जुन ने तीन नामों से भगवान को पुकारा — महाबाहो, हृषीकेश, और केशिनिषूदन। यह दर्शाता है कि वे श्रद्धा और आग्रह दोनों के साथ पूछ रहे हैं। गीता का यह अंतिम अध्याय सारे उत्तर लेकर आता है।

यह श्लोक पूरे अठारहवें अध्याय का द्वार है। भगवद्गीता के अनुसार यहाँ से 'मोक्षसंन्यासयोग' आरंभ होता है।

संन्यास और त्याग — दोनों शब्द देखने में एक जैसे लगते हैं, पर गीता इन्हें अलग-अलग परिभाषित करती है। अगले श्लोकों में यही स्पष्ट होगा।

अध्याय 18 · 1 / 78
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