📿 श्लोक संग्रह

सत्त्वानुरूपा सर्वस्य

गीता 17.3 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 17 — श्रद्धात्रयविभागयोग
सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत ।
श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः ॥
सत्त्वानुरूपा
सत्त्व के अनुसार
सर्वस्य
सबकी
श्रद्धा
आस्था
भवति
होती है
भारत
हे अर्जुन
श्रद्धामयः
श्रद्धा से बना हुआ
अयम्
यह
पुरुषः
मनुष्य
यः
जो
यच्छ्रद्धः
जैसी श्रद्धा वाला
सः एव सः
वह वही है

भगवान कृष्ण कहते हैं कि हर व्यक्ति की श्रद्धा उसके अंतःकरण के अनुसार होती है। जिसका हृदय जैसा है, उसकी आस्था भी वैसी ही होगी। यह बहुत गहरी बात है — मनुष्य वही है जो उसकी श्रद्धा है।

जैसे पानी जिस बर्तन में रखा जाए उसी का आकार ले लेता है, वैसे ही श्रद्धा भी व्यक्ति के स्वभाव के अनुसार ढल जाती है। सात्त्विक स्वभाव का व्यक्ति देवताओं और ज्ञान की ओर आकर्षित होगा, राजसिक शक्ति और भोग की ओर, और तामसिक अंधकार और जड़ता की ओर।

इसका सबसे सुंदर अर्थ यह है कि यदि हम अपनी श्रद्धा को ऊँचा उठाना चाहें, तो हमें अपने स्वभाव को शुद्ध करना होगा। श्रद्धा बाहर से नहीं बदलती, भीतर से बदलती है।

यह श्लोक भारतीय दर्शन का एक मूलभूत सिद्धांत प्रस्तुत करता है — मनुष्य का व्यक्तित्व उसकी श्रद्धा से परिभाषित होता है। "यो यच्छ्रद्धः स एव सः" — यह वाक्य गीता के सबसे प्रसिद्ध वचनों में से एक है।

इस श्लोक के बाद भगवान विस्तार से बताते हैं कि तीनों गुणों वाले लोग किसकी पूजा करते हैं।

अध्याय 17 · 3 / 28
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