भगवान कृष्ण कहते हैं कि हर व्यक्ति की श्रद्धा उसके अंतःकरण के अनुसार होती है। जिसका हृदय जैसा है, उसकी आस्था भी वैसी ही होगी। यह बहुत गहरी बात है — मनुष्य वही है जो उसकी श्रद्धा है।
जैसे पानी जिस बर्तन में रखा जाए उसी का आकार ले लेता है, वैसे ही श्रद्धा भी व्यक्ति के स्वभाव के अनुसार ढल जाती है। सात्त्विक स्वभाव का व्यक्ति देवताओं और ज्ञान की ओर आकर्षित होगा, राजसिक शक्ति और भोग की ओर, और तामसिक अंधकार और जड़ता की ओर।
इसका सबसे सुंदर अर्थ यह है कि यदि हम अपनी श्रद्धा को ऊँचा उठाना चाहें, तो हमें अपने स्वभाव को शुद्ध करना होगा। श्रद्धा बाहर से नहीं बदलती, भीतर से बदलती है।