📿 श्लोक संग्रह

तदित्यनभिसन्धाय

गीता 17.25 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 17 — श्रद्धात्रयविभागयोग
तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपःक्रियाः ।
दानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः ॥
तत्
वह (ब्रह्म)
इति
ऐसा कहकर
अनभिसन्धाय
बिना फल का लक्ष्य रखे
फलम्
फल
यज्ञतपःक्रियाः
यज्ञ और तप की क्रियाएँ
दानक्रियाः
दान की क्रियाएँ
विविधाः
अनेक प्रकार की
क्रियन्ते
की जाती हैं
मोक्षकाङ्क्षिभिः
मोक्ष चाहने वालों द्वारा

भगवान कृष्ण बताते हैं कि "तत्" (अर्थात "वह ब्रह्म") — ऐसा कहकर, बिना फल की इच्छा रखे, मोक्ष चाहने वाले लोग अनेक प्रकार के यज्ञ, तप और दान की क्रियाएँ करते हैं।

"तत्" शब्द का प्रयोग कर्म को "उस" परम सत्ता को समर्पित करने का भाव व्यक्त करता है। जब कोई "तत्" कहकर कर्म करता है, तो वह कह रहा है — "यह मेरे लिए नहीं, उस परमात्मा के लिए है।" इससे कर्म में स्वार्थ का लेश भी नहीं रहता।

मोक्ष की कामना रखने वाले साधक अपने सभी कर्मों को ब्रह्म को समर्पित करते हैं — यही "तत्" शब्द का व्यावहारिक अर्थ है। जब कर्म ईश्वर-अर्पित हो जाता है, तो वह बंधन का कारण नहीं रहता।

यह श्लोक "ॐ तत् सत्" त्रय में "तत्" शब्द की व्याख्या करता है। पिछले श्लोक (17.24) में "ॐ" और अगले श्लोकों (17.26–17.27) में "सत्" की व्याख्या होगी।

"तत्" शब्द उपनिषदों के महावाक्य "तत् त्वम् असि" (तू वही है) से भी जुड़ा है — यह ब्रह्म की ओर संकेत करने वाला सर्वाधिक संक्षिप्त शब्द है।

अध्याय 17 · 25 / 28
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