भगवान कृष्ण बताते हैं कि "तत्" (अर्थात "वह ब्रह्म") — ऐसा कहकर, बिना फल की इच्छा रखे, मोक्ष चाहने वाले लोग अनेक प्रकार के यज्ञ, तप और दान की क्रियाएँ करते हैं।
"तत्" शब्द का प्रयोग कर्म को "उस" परम सत्ता को समर्पित करने का भाव व्यक्त करता है। जब कोई "तत्" कहकर कर्म करता है, तो वह कह रहा है — "यह मेरे लिए नहीं, उस परमात्मा के लिए है।" इससे कर्म में स्वार्थ का लेश भी नहीं रहता।
मोक्ष की कामना रखने वाले साधक अपने सभी कर्मों को ब्रह्म को समर्पित करते हैं — यही "तत्" शब्द का व्यावहारिक अर्थ है। जब कर्म ईश्वर-अर्पित हो जाता है, तो वह बंधन का कारण नहीं रहता।