📿 श्लोक संग्रह

तस्मादोमित्युदाहृत्य

गीता 17.24 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 17 — श्रद्धात्रयविभागयोग
तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः ।
प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम् ॥
तस्मात्
इसलिए
ॐकार
इति
ऐसा
उदाहृत्य
उच्चारण करके
यज्ञदानतपःक्रियाः
यज्ञ, दान और तप की क्रियाएँ
प्रवर्तन्ते
आरंभ होती हैं
विधानोक्ताः
शास्त्र-विधि के अनुसार
सततम्
सदैव
ब्रह्मवादिनाम्
ब्रह्मवादियों की

भगवान कृष्ण बताते हैं कि इसीलिए ब्रह्मवादी (ब्रह्म को जानने वाले) लोग शास्त्र-विधि के अनुसार यज्ञ, दान और तप की क्रियाएँ सदैव "ॐ" का उच्चारण करके आरंभ करते हैं।

"ॐ" का उच्चारण किसी भी शुभ कर्म को ब्रह्म से जोड़ देता है। जैसे किसी पत्र पर राजा की मुहर लगने से वह अधिकृत हो जाता है, वैसे ही "ॐ" का उच्चारण किसी भी कर्म को पवित्र और ब्रह्म-समर्पित बना देता है।

हमारे घरों में भी देखिए — कोई भी पूजा, हवन या शुभ कार्य "ॐ" से ही आरंभ होता है। यह परंपरा गीता की इसी शिक्षा से आई है।

यह श्लोक "ॐ तत् सत्" त्रय में "ॐ" की विशेष भूमिका बताता है। अगले श्लोक (17.25) में "तत्" और उसके बाद (17.26–17.27) में "सत्" की व्याख्या होगी।

ॐकार को सभी वैदिक मंत्रों का बीज माना जाता है। छान्दोग्य उपनिषद में कहा गया है कि जैसे पत्तियाँ शिरा से जुड़ी रहती हैं, वैसे ही सम्पूर्ण वाणी ॐकार से जुड़ी है।

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