भगवान कृष्ण बताते हैं कि इसीलिए ब्रह्मवादी (ब्रह्म को जानने वाले) लोग शास्त्र-विधि के अनुसार यज्ञ, दान और तप की क्रियाएँ सदैव "ॐ" का उच्चारण करके आरंभ करते हैं।
"ॐ" का उच्चारण किसी भी शुभ कर्म को ब्रह्म से जोड़ देता है। जैसे किसी पत्र पर राजा की मुहर लगने से वह अधिकृत हो जाता है, वैसे ही "ॐ" का उच्चारण किसी भी कर्म को पवित्र और ब्रह्म-समर्पित बना देता है।
हमारे घरों में भी देखिए — कोई भी पूजा, हवन या शुभ कार्य "ॐ" से ही आरंभ होता है। यह परंपरा गीता की इसी शिक्षा से आई है।