📿 श्लोक संग्रह

त्रिविधा भवति श्रद्धा

गीता 17.2 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 17 — श्रद्धात्रयविभागयोग
श्रीभगवानुवाच — त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा ।
सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृणु ॥
त्रिविधा
तीन प्रकार की
भवति
होती है
श्रद्धा
आस्था
देहिनाम्
देहधारियों की
सा
वह
स्वभावजा
स्वभाव से उत्पन्न
सात्त्विकी
सात्त्विक
राजसी
राजसिक
तामसी
तामसिक
शृणु
सुनो

अर्जुन के प्रश्न का उत्तर देते हुए भगवान कृष्ण कहते हैं कि प्रत्येक प्राणी की श्रद्धा तीन प्रकार की होती है — सात्त्विक, राजसिक और तामसिक। यह श्रद्धा उसके स्वभाव से उत्पन्न होती है, यानी जिस गुण का प्रभाव जिस व्यक्ति पर अधिक है, उसकी श्रद्धा भी वैसी ही होगी।

जैसे एक ही बगीचे में अलग-अलग पौधे अलग-अलग फूल देते हैं, वैसे ही अलग-अलग स्वभाव के लोगों की श्रद्धा भी भिन्न होती है। कोई शांति और ज्ञान की ओर आकर्षित होता है, कोई दिखावे और शक्ति की ओर, और कोई अंधविश्वास की ओर।

भगवान कृष्ण अर्जुन को कहते हैं — सुनो, मैं तुम्हें इन तीनों प्रकार की श्रद्धा के बारे में विस्तार से बताता हूँ। यह पूरे अध्याय की भूमिका है।

यह श्लोक अध्याय 17 का मूल सिद्धांत प्रस्तुत करता है। भगवान यहाँ स्पष्ट करते हैं कि श्रद्धा कोई एक समान चीज़ नहीं है — वह व्यक्ति के आंतरिक स्वभाव से निर्धारित होती है।

आगे के श्लोकों में भगवान इस त्रिगुणात्मक विभाजन को आहार, यज्ञ, तप और दान — हर क्षेत्र में लागू करके समझाएँगे।

अध्याय 17 · 2 / 28
← पिछला अध्याय 17 · 2 / 28 अगला →