📿 श्लोक संग्रह

मनःप्रसादः सौम्यत्वं

गीता 17.16 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 17 — श्रद्धात्रयविभागयोग
मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः ।
भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते ॥
मनःप्रसादः
मन की प्रसन्नता
सौम्यत्वम्
सौम्य स्वभाव
मौनम्
मौन / चुप्पी
आत्मविनिग्रहः
आत्म-संयम
भावसंशुद्धिः
भाव की शुद्धि
इति
यह
एतत्
यह सब
तपः
तपस्या
मानसम्
मन संबंधी

भगवान कृष्ण बताते हैं कि मानसिक तपस्या क्या है — मन की प्रसन्नता, सौम्य स्वभाव, मौन का अभ्यास, आत्म-संयम और भावों की शुद्धि — ये सब मानसिक तप कहलाते हैं।

मन की प्रसन्नता का अर्थ है — भीतर से शांत और संतुष्ट रहना। सौम्यता का अर्थ है — कोमल और विनम्र स्वभाव। मौन का अर्थ केवल चुप रहना नहीं, बल्कि मन को बेकार के विचारों से रोकना है। आत्मविनिग्रह का अर्थ है — अपनी इंद्रियों और मन पर नियंत्रण रखना।

सबसे महत्वपूर्ण है "भावसंशुद्धि" — अर्थात हृदय के भावों को शुद्ध रखना। जब मन में ईर्ष्या, द्वेष और कपट नहीं रहता, तब भावसंशुद्धि होती है। यही मानसिक तप का सार है।

यह श्लोक तप-त्रय का तीसरा और सबसे गहरा भाग है। शरीर और वाणी का तप बाहर से दिखता है, लेकिन मन का तप भीतर से होता है — और यही सबसे कठिन भी है।

अगले श्लोकों (17.17–17.19) में भगवान इन तीनों तपों को सात्त्विक, राजसिक और तामसिक श्रेणियों में बाँटेंगे।

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