भगवान कृष्ण बताते हैं कि मानसिक तपस्या क्या है — मन की प्रसन्नता, सौम्य स्वभाव, मौन का अभ्यास, आत्म-संयम और भावों की शुद्धि — ये सब मानसिक तप कहलाते हैं।
मन की प्रसन्नता का अर्थ है — भीतर से शांत और संतुष्ट रहना। सौम्यता का अर्थ है — कोमल और विनम्र स्वभाव। मौन का अर्थ केवल चुप रहना नहीं, बल्कि मन को बेकार के विचारों से रोकना है। आत्मविनिग्रह का अर्थ है — अपनी इंद्रियों और मन पर नियंत्रण रखना।
सबसे महत्वपूर्ण है "भावसंशुद्धि" — अर्थात हृदय के भावों को शुद्ध रखना। जब मन में ईर्ष्या, द्वेष और कपट नहीं रहता, तब भावसंशुद्धि होती है। यही मानसिक तप का सार है।