📿 श्लोक संग्रह

अनुद्वेगकरं वाक्यं

गीता 17.15 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 17 — श्रद्धात्रयविभागयोग
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् ।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते ॥
अनुद्वेगकरम्
उद्वेग न करने वाला
वाक्यम्
वचन
सत्यम्
सत्य
प्रियहितम्
प्रिय और हितकारी
और
यत्
जो
स्वाध्यायाभ्यसनम्
स्वाध्याय का अभ्यास
वाङ्मयम्
वाणी संबंधी
तपः
तपस्या

भगवान कृष्ण बताते हैं कि वाणी की तपस्या क्या है — ऐसे वचन बोलना जो किसी को कष्ट न दें, जो सत्य हों, प्रिय हों और हितकारी हों। साथ ही शास्त्रों का स्वाध्याय करना — यह सब वाचिक तप है।

ध्यान दीजिए कि भगवान ने चार गुण बताए हैं — वाणी उद्वेग-रहित हो, सत्य हो, प्रिय हो और हितकारी हो। कभी-कभी सत्य कड़वा होता है, तो उसे प्रिय तरीक़े से कहना चाहिए। कभी प्रिय बात हितकारी नहीं होती, तो हित को प्राथमिकता देनी चाहिए।

दादा-दादी जो बच्चों को प्यार से कहानियाँ सुनाते हैं, जो शाम को रामायण या गीता का पाठ करते हैं — वे वाचिक तप ही कर रहे हैं। मीठी वाणी और शास्त्र-पाठ — यही वाणी की सबसे सुंदर तपस्या है।

यह श्लोक तप-त्रय का दूसरा भाग है। पिछले श्लोक (17.14) में शारीरिक और अगले (17.16) में मानसिक तप बताया गया है।

वाणी की शक्ति अपार है — एक मीठा शब्द किसी का दिन बना सकता है, और एक कटु वचन किसी का हृदय तोड़ सकता है। इसलिए वाणी को संयमित रखना एक महान तपस्या है।

अध्याय 17 · 15 / 28
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