📿 श्लोक संग्रह

विधिहीनमसृष्टान्नं

गीता 17.13 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 17 — श्रद्धात्रयविभागयोग
विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम् ।
श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते ॥
विधिहीनम्
विधि-रहित
असृष्टान्नम्
अन्नदान रहित
मन्त्रहीनम्
मन्त्रों के बिना
अदक्षिणम्
दक्षिणा रहित
श्रद्धाविरहितम्
श्रद्धा से रहित
यज्ञम्
यज्ञ को
तामसम्
तामसिक
परिचक्षते
कहा जाता है

भगवान कृष्ण बताते हैं कि जो यज्ञ विधि-रहित हो, जिसमें अन्नदान न हो, मंत्रोच्चारण न हो, दक्षिणा न दी जाए, और सबसे बड़ी बात — जिसमें श्रद्धा ही न हो — वह तामसिक यज्ञ कहलाता है।

तामसिक यज्ञ में कोई भी आवश्यक तत्व नहीं होता। न विधि है, न भाव है, न सेवा है, न समर्पण है। यह एक खोखला कर्मकांड है — बस करने के लिए किया जाता है, बिना किसी गहरी भावना के।

इसमें सबसे महत्वपूर्ण दोष "श्रद्धाविरहित" होना है। बिना श्रद्धा के कोई भी कर्म निष्फल है। भगवान यहाँ स्पष्ट करते हैं कि यज्ञ का मूल श्रद्धा है — बाकी सब उसके अंग हैं।

यह श्लोक यज्ञ-विभाग का तीसरा और अंतिम भाग है। श्लोक 17.11 (सात्त्विक), 17.12 (राजसिक) और 17.13 (तामसिक) — तीनों मिलकर यज्ञ का संपूर्ण वर्गीकरण प्रस्तुत करते हैं।

अगले श्लोक से भगवान तप (तपस्या) के तीन प्रकारों — शारीरिक, वाचिक और मानसिक — का वर्णन आरंभ करते हैं।

अध्याय 17 · 13 / 28
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