भगवान कृष्ण कहते हैं कि हे भरतश्रेष्ठ अर्जुन, जो यज्ञ फल की इच्छा से या दिखावे के लिए किया जाता है, उसे राजसिक यज्ञ जानो।
राजसिक यज्ञ में व्यक्ति की प्रेरणा शुद्ध नहीं होती। वह या तो किसी भौतिक लाभ की आशा रखता है — जैसे धन, यश, संतान — या फिर वह दूसरों को दिखाने के लिए पूजा करता है कि देखो मैं कितना धार्मिक हूँ।
ऐसा यज्ञ पूरी तरह बुरा नहीं है, लेकिन यह सात्त्विक यज्ञ जितना शुद्ध भी नहीं है। जब तक कर्म के पीछे लाभ या दिखावे की भावना है, तब तक वह राजसिक ही रहेगा।