📿 श्लोक संग्रह

अभिसन्धाय तु फलं

गीता 17.12 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 17 — श्रद्धात्रयविभागयोग
अभिसन्धाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत् ।
इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम् ॥
अभिसन्धाय
लक्ष्य रखकर
फलम्
फल को
दम्भार्थम्
दिखावे के लिए
अपि
भी
और
इज्यते
किया जाता है
भरतश्रेष्ठ
हे भरतश्रेष्ठ
तम्
उस
यज्ञम्
यज्ञ को
राजसम्
राजसिक

भगवान कृष्ण कहते हैं कि हे भरतश्रेष्ठ अर्जुन, जो यज्ञ फल की इच्छा से या दिखावे के लिए किया जाता है, उसे राजसिक यज्ञ जानो।

राजसिक यज्ञ में व्यक्ति की प्रेरणा शुद्ध नहीं होती। वह या तो किसी भौतिक लाभ की आशा रखता है — जैसे धन, यश, संतान — या फिर वह दूसरों को दिखाने के लिए पूजा करता है कि देखो मैं कितना धार्मिक हूँ।

ऐसा यज्ञ पूरी तरह बुरा नहीं है, लेकिन यह सात्त्विक यज्ञ जितना शुद्ध भी नहीं है। जब तक कर्म के पीछे लाभ या दिखावे की भावना है, तब तक वह राजसिक ही रहेगा।

यह श्लोक राजसिक यज्ञ का वर्णन करता है। पिछले श्लोक में सात्त्विक यज्ञ और अगले में तामसिक यज्ञ बताया गया है।

दम्भ (पाखंड/दिखावा) शब्द गीता में बार-बार आता है — भगवान ने 16वें अध्याय में भी इसे आसुरी संपत्ति में गिनाया है।

अध्याय 17 · 12 / 28
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