📿 श्लोक संग्रह

असत्यमप्रतिष्ठं ते

गीता 16.8 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 16 — दैवासुरसम्पद्विभागयोग
असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् ।
अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम् ॥
असत्यम्
असत्य (झूठा)
अप्रतिष्ठम्
बिना आधार का
ते
वे (आसुरी लोग)
जगत्
संसार को
आहुः
कहते हैं
अनीश्वरम्
ईश्वर-रहित
अपरस्परसम्भूतम्
बिना किसी क्रम के उत्पन्न
किम् अन्यत्
और क्या (कुछ नहीं)
कामहैतुकम्
काम (वासना) ही कारण है

अब भगवान बताते हैं कि आसुरी लोग इस संसार को कैसे देखते हैं। वे कहते हैं — यह जगत असत्य है, इसका कोई नैतिक आधार नहीं है, कोई ईश्वर नहीं है जिसने इसे बनाया।

आसुरी विचारधारा मानती है कि सृष्टि बिना किसी उद्देश्य के, बिना किसी क्रम के बस ऐसे ही बन गई। और अगर कोई कारण है भी तो वह केवल काम (वासना) है — स्त्री-पुरुष के संयोग से सब कुछ बना, बस इतनी सी बात है।

यह दृष्टिकोण बहुत खतरनाक है — क्योंकि जब कोई मानता है कि न ईश्वर है, न कोई नैतिक व्यवस्था है, तो वह कुछ भी करने को तैयार हो जाता है। यही आसुरी सोच की जड़ है।

यह श्लोक आसुरी दर्शन (विचारधारा) को संक्षेप में प्रस्तुत करता है। प्राचीन भारत में भी ऐसी विचारधाराएँ थीं जो ईश्वर और धर्म को नहीं मानती थीं। भगवान यहाँ उस सोच के खतरों को उजागर कर रहे हैं।

"अपरस्परसम्भूतम्" — यह कहना कि सृष्टि में कोई क्रम नहीं है, नैतिकता की जड़ ही काट देता है।

अध्याय 16 · 8 / 24
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