📿 श्लोक संग्रह

द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन्

गीता 16.6 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 16 — दैवासुरसम्पद्विभागयोग
द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन्दैव आसुर एव च ।
दैवो विस्तरशः प्रोक्तः आसुरं पार्थ मे शृणु ॥
द्वौ
दो
भूतसर्गौ
प्राणियों की सृष्टि
लोके अस्मिन्
इस संसार में
दैवः
दैवी (दिव्य)
आसुरः
आसुरी
एव च
ही और
विस्तरशः
विस्तार से
प्रोक्तः
कहा गया
आसुरम्
आसुरी स्वभाव
मे शृणु
मुझसे सुनो

भगवान कहते हैं — इस संसार में दो प्रकार के प्राणी हैं: एक दैवी स्वभाव वाले और दूसरे आसुरी स्वभाव वाले। यह विभाजन जाति या वर्ण का नहीं, बल्कि स्वभाव और गुणों का है।

दैवी स्वभाव के बारे में विस्तार से बता दिया गया (श्लोक 1-3 में)। अब भगवान कहते हैं — हे अर्जुन! आसुरी स्वभाव के बारे में मुझसे सुनो।

यहाँ "मे शृणु" (मुझसे सुनो) कहने में भगवान की करुणा झलकती है। वे चाहते हैं कि अर्जुन आसुरी गुणों को पहचान ले ताकि उनसे बच सके।

यह श्लोक एक पुल है — दैवी सम्पदा के वर्णन से आसुरी सम्पदा के विस्तृत वर्णन की ओर। आगे श्लोक 7 से 20 तक आसुरी स्वभाव का बहुत विस्तृत चित्रण किया गया है।

अध्याय 16 · 6 / 24
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