भगवान अब आसुरी लोगों का परिणाम बताते हैं। ये लोग अनेक प्रकार के विचारों से भ्रमित रहते हैं — मन कभी इधर भागता है, कभी उधर। एक निश्चय नहीं, एक दिशा नहीं — बस भटकते रहते हैं।
"मोहजालसमावृताः" — ये मोह के जाल में इस तरह लिपटे हुए हैं जैसे मछली जाल में फँस जाती है। जितना छटपटाएँ, उतना और फँसते जाएँ।
भोगों में आसक्त ये लोग अंततः अपवित्र नरक में गिरते हैं। यहाँ "नरक" का अर्थ केवल मरने के बाद का नहीं — जीते-जी भी दुख, अशांति और पतन का अनुभव नरक ही है।