आसुरी मन का आत्म-संवाद और आगे बढ़ता है: "उस शत्रु को तो मैंने मार गिराया, अब बाकी दुश्मनों को भी मार दूँगा।" — यह हिंसा और प्रतिशोध की मानसिकता है।
फिर अहंकार की चरम सीमा: "मैं ईश्वर हूँ, मैं भोगी हूँ, मैं सिद्ध हूँ, मैं बलवान हूँ, मैं सुखी हूँ।" — हर वाक्य में "अहम्" (मैं) है। यह व्यक्ति खुद को ही भगवान मानता है।
ध्यान दीजिए — "सुखी" अंत में आता है। ऐसा व्यक्ति खुद को सुखी "मानता" है, पर वास्तव में सुखी नहीं है। अगले श्लोकों में इसी बात की पुष्टि होती है।