📿 श्लोक संग्रह

आशापाशशतैर्बद्धाः

गीता 16.12 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 16 — दैवासुरसम्पद्विभागयोग
आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः ।
ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसञ्चयान् ॥
आशापाशशतैः
आशा के सैकड़ों फन्दों से
बद्धाः
बँधे हुए
कामक्रोधपरायणाः
काम और क्रोध में लगे
ईहन्ते
प्रयत्न करते हैं
कामभोगार्थम्
भोग के लिए
अन्यायेन
अन्याय से
अर्थसञ्चयान्
धन का संग्रह

आसुरी लोग आशा के सैकड़ों जालों में फँसे रहते हैं। "आशापाशशतैः" — जैसे शिकारी जानवर को जाल में फँसाता है, वैसे ही आशाएँ इन लोगों को जकड़े रहती हैं। एक उम्मीद पूरी नहीं हुई कि दूसरी बन जाती है।

ये लोग काम (इच्छा) और क्रोध के वश में रहते हैं। जब इच्छा पूरी नहीं होती तो क्रोध आता है, और क्रोध से फिर नई इच्छा उत्पन्न होती है — यह एक दुष्चक्र है।

इन भोगों को पूरा करने के लिए ये लोग अन्याय से धन इकट्ठा करते हैं। "अन्यायेन" — गलत तरीकों से, दूसरों को ठगकर, शोषण करके। इनके लिए साधन का कोई महत्व नहीं — बस लक्ष्य (भोग) पूरा होना चाहिए।

"आशापाशशतैः" एक बहुत सुन्दर और शक्तिशाली रूपक है — आशा एक फन्दा है, और ऐसे सैकड़ों फन्दों में ये लोग बँधे हैं। यह चित्र हमें सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम भी कहीं ऐसे ही फन्दों में तो नहीं फँसे?

अध्याय 16 · 12 / 24
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