आसुरी लोग आशा के सैकड़ों जालों में फँसे रहते हैं। "आशापाशशतैः" — जैसे शिकारी जानवर को जाल में फँसाता है, वैसे ही आशाएँ इन लोगों को जकड़े रहती हैं। एक उम्मीद पूरी नहीं हुई कि दूसरी बन जाती है।
ये लोग काम (इच्छा) और क्रोध के वश में रहते हैं। जब इच्छा पूरी नहीं होती तो क्रोध आता है, और क्रोध से फिर नई इच्छा उत्पन्न होती है — यह एक दुष्चक्र है।
इन भोगों को पूरा करने के लिए ये लोग अन्याय से धन इकट्ठा करते हैं। "अन्यायेन" — गलत तरीकों से, दूसरों को ठगकर, शोषण करके। इनके लिए साधन का कोई महत्व नहीं — बस लक्ष्य (भोग) पूरा होना चाहिए।