📿 श्लोक संग्रह

चिन्तामपरिमेयां च

गीता 16.11 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 16 — दैवासुरसम्पद्विभागयोग
चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः ।
कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः ॥
चिन्ताम्
चिन्ता
अपरिमेयाम्
अनन्त (बेहिसाब)
प्रलयान्ताम्
मृत्यु तक बनी रहने वाली
उपाश्रिताः
आश्रय लिए हुए
कामोपभोगपरमाः
भोग ही जिनका परम लक्ष्य
एतावत्
बस इतना ही
इति
ऐसा
निश्चिताः
निश्चित मानने वाले

आसुरी लोग अनगिनत चिन्ताओं में डूबे रहते हैं — और ये चिन्ताएँ मरने तक पीछा नहीं छोड़तीं। "अपरिमेयाम्" — जिसका कोई हिसाब नहीं। एक चिन्ता ख़त्म नहीं होती कि दूसरी शुरू।

इन लोगों का जीवन का एकमात्र लक्ष्य है — काम (इच्छाओं) का भोग। वे मानते हैं कि बस यही सब कुछ है — खाना, पीना, भोगना, और कुछ नहीं।

"एतावदिति निश्चिताः" — इन्होंने पक्का मान लिया है कि जीवन का उद्देश्य बस भोग ही है। इससे बड़ा कोई सत्य नहीं — ऐसा इनका अटल विश्वास है। यह सोच ही उन्हें अनन्त चिन्ता में डाल देती है।

"प्रलयान्ताम्" (मृत्यु तक) — भगवान बताते हैं कि आसुरी व्यक्ति को मृत्यु तक चिन्ता से मुक्ति नहीं मिलती। जो व्यक्ति भोग को ही सब कुछ मानता है, वह सदा असंतुष्ट रहता है।

यह श्लोक आधुनिक जीवनशैली पर भी लागू होता है — अनन्त इच्छाएँ, अनन्त चिन्ता, और शान्ति कहीं नहीं।

अध्याय 16 · 11 / 24
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