15.7 में बताया कि जीव मन और इंद्रियों को आकर्षित करता है। 15.8 में बताया कि ये उसके साथ चलती हैं। अब 15.9 में बताया जा रहा है — इनके माध्यम से जीव क्या करता है? विषयों का सेवन।
पाँच कर्मेंद्रियाँ हैं — कान से ध्वनि, आँख से रूप, त्वचा से स्पर्श, जिह्वा से रस, नाक से गंध। और इन सबके पीछे मन है — जो तय करता है किस विषय में जाना है और किसमें नहीं। जीव इन छहों के द्वारा संसार से जुड़ा रहता है।
यह वर्णन बुरा नहीं है — यह सिर्फ़ यथार्थ है। जैसे घर में खिड़कियाँ होती हैं — उनसे रोशनी भी आती है, धूल भी। इंद्रियाँ ऐसी ही खिड़कियाँ हैं।