📿 श्लोक संग्रह

शरीरं यदवाप्नोति

गीता 15.8 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 15 — पुरुषोत्तमयोग
शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः ।
गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात् ॥
शरीरम् यत् अवाप्नोति
जो शरीर ग्रहण करता है
यत् च अपि उत्क्रामति
और जब छोड़ता भी है
ईश्वरः
जीवात्मा (यहाँ देह का स्वामी)
गृहीत्वा एतानि
इन्हें (मन-इंद्रियों को) लेकर
संयाति
चला जाता है
वायुः गन्धान् इव
जैसे वायु गंध को
आशयात्
स्थान से

श्रीकृष्ण यहाँ एक बहुत सरल उपमा देते हैं। जब हम फूलों के बाग से गुज़रते हैं तो हवा उस फूल की खुशबू को साथ ले आती है। हवा को हम देख नहीं सकते, लेकिन खुशबू आती है — हमें पता चलता है हवा वहाँ से आई।

ठीक ऐसे ही, जब जीव एक शरीर छोड़कर दूसरे में जाता है, तो अपने संस्कारों — मन और इंद्रियों की आदतों — को साथ ले जाता है। शरीर छूट जाता है, पर भीतर की प्रवृत्तियाँ नहीं छूटतीं।

यहाँ जीव को 'ईश्वरः' कहा गया है — अपने शरीर का स्वामी। यह छोटा-सा शब्द बताता है कि जीव निर्जीव नहीं, वह सक्रिय है, चेतन है।

15.7 में जीव की ईश्वर-अंशता थी। 15.8 उसकी यात्रा का वर्णन करता है — शरीर ग्रहण करना और छोड़ना। वायु-गंध की उपमा गीता की सरलतम उपमाओं में से एक मानी जाती है।

परंपरा में इस श्लोक को पुनर्जन्म की अवधारणा के सरल प्रमाण के रूप में उद्धृत किया जाता रहा है। मन और इंद्रियाँ सूक्ष्म शरीर के अंग हैं जो जीव के साथ यात्रा करते हैं — यह विचार इस श्लोक का मूल है।

अध्याय 15 · 8 / 20
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