📿 श्लोक संग्रह

अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य

गीता 15.2 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 15 — पुरुषोत्तमयोग
अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः ।
अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके ॥
अधः च ऊर्ध्वम्
नीचे और ऊपर
प्रसृताः
फैली हुई
तस्य
उस (वृक्ष) की
शाखाः
शाखाएँ
गुणप्रवृद्धाः
तीनों गुणों से बढ़ी हुई
विषयप्रवालाः
विषय-भोग ही जिनके अंकुर हैं
अधः च
नीचे भी
मूलानि
जड़ें
अनुसन्ततानि
फैली हुई हैं
कर्मानुबन्धीनि
कर्मों से बँधी हुई
मनुष्यलोके
मनुष्य लोक में

पहले श्लोक में संसार को उलटे पीपल से जोड़ा गया। अब यहाँ उस पेड़ का और विस्तार किया गया है। इस पेड़ की शाखाएँ ऊपर भी हैं — देवलोक तक — और नीचे भी — पशु-पक्षी और कीट-पतंग तक। तीनों गुण — सत्व, रज, तम — इन्हीं शाखाओं को पोषण देते हैं।

इन शाखाओं के अंकुर विषय-भोग हैं — जो हम देखते, सुनते, छूते, चाहते हैं। बीज से पेड़ उगता है, पेड़ से फिर बीज — ऐसे ही कर्म से जन्म और जन्म से फिर कर्म। यही चक्र है।

नीचे की जड़ें मनुष्य लोक में हैं क्योंकि यहीं से कर्म का बंधन बनता है। मनुष्य ही एकमात्र प्राणी है जो कर्म करने में स्वतंत्र है। इसीलिए यहाँ की जड़ें कर्मों से बँधी बताई गई हैं।

यह श्लोक अध्याय 15 के दूसरे क्रम में आता है। पहले श्लोक में अश्वत्थ वृक्ष का परिचय हुआ। इस श्लोक में उस रूपक का विस्तार हुआ — शाखाएँ, अंकुर और जड़ों के माध्यम से यह समझाया गया कि संसार-चक्र कैसे चलता रहता है।

परंपरा में इस श्लोक को कर्म-बंधन की व्याख्या के रूप में देखा जाता रहा है। गीता प्रेस के भाष्य में इसे मनुष्य की विशिष्ट स्थिति — कर्ता होने की — के प्रसंग में उद्धृत किया गया है।

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