यहाँ से श्रीकृष्ण एक नई बात शुरू करते हैं — अस्तित्व के दो प्रकार। पहला क्षर — जो बदलता रहता है, जो आता-जाता है। यह सब प्राणी, सब पदार्थ, सब नाम-रूप। दूसरा अक्षर — जो नहीं बदलता, जो टिका रहता है।
अक्षर को 'कूटस्थ' कहा गया — जैसे पर्वत की चट्टान पर निहाई (कूट) रखकर धातु को कूटा जाता है, पर निहाई नहीं हिलती — वैसे ही यह अक्षर अविचल है। सब कुछ उसके आसपास बदलता है, वह नहीं।
यह विभाजन समझने से संसार की समझ साफ़ होती है। जो दिखता है — क्षर है। जो भीतर टिका है — अक्षर है।