यह गीता का एक ऐसा श्लोक है जो प्रत्येक भोजन के समय याद आता है। 'अहं वैश्वानरो भूत्वा' — मैं वैश्वानर (जठर-अग्नि) बनकर तुम्हारे भीतर रहता हूँ। जो भोजन तुम खाते हो — चबाकर, पीकर, चाटकर या चूसकर — यह चारों प्रकार का भोजन मैं ही पचाता हूँ।
इसीलिए भोजन से पहले परंपरा में यह श्लोक पढ़ा जाता है। भोजन केवल पेट भरना नहीं — उस परमात्मा को अर्पण है जो हमारे भीतर जठराग्नि के रूप में बैठा है।
जैसे घर में चूल्हा जलता है और उसकी आँच पर सब पकता है — उस आँच को हम अलग से नहीं देखते, पर वह है। वैश्वानर वैसी ही आंतरिक अग्नि है।