इस श्लोक में एक बहुत अनोखी उपमा दी गई है — संसार एक उलटा पेड़ है। इसकी जड़ें ऊपर हैं (ब्रह्म में, परमात्मा में) और शाखाएँ नीचे फैली हुई हैं (इस भौतिक संसार में)। यह पीपल का पेड़ (अश्वत्थ) कहा गया है।
इसे ऐसे समझो — जब हम नदी के किनारे खड़े होते हैं तो पेड़ का प्रतिबिंब पानी में उलटा दिखाई देता है — जड़ें ऊपर, शाखाएँ नीचे। यह संसार भी वैसा ही है — असली सत्ता (जड़) ऊपर है, और जो हम देखते हैं वह प्रतिबिंब है।
वेदों के मंत्र इस पेड़ के पत्ते हैं — जैसे पत्ते पेड़ को हरा-भरा दिखाते हैं, वैसे ही वेद-मंत्र इस संसार-रूपी पेड़ को विस्तृत करते हैं। और जो इस पूरे पेड़ को — इसकी जड़, शाखाओं और पत्तों सहित — जान लेता है, वही सच्चा वेद-ज्ञानी है।