📿 श्लोक संग्रह

ऊर्ध्वमूलमधःशाखम्

गीता 15.1 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 15 — पुरुषोत्तमयोग
ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् ।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥
ऊर्ध्वमूलम्
ऊपर जड़ों वाला
अधःशाखम्
नीचे शाखाओं वाला
अश्वत्थम्
पीपल का पेड़
प्राहुः
कहते हैं
अव्ययम्
अविनाशी
छन्दांसि
वेद-मंत्र
यस्य
जिसके
पर्णानि
पत्ते
यः
जो
तम्
उसको
वेद
जानता है
सः
वह
वेदवित्
वेदों का ज्ञाता

इस श्लोक में एक बहुत अनोखी उपमा दी गई है — संसार एक उलटा पेड़ है। इसकी जड़ें ऊपर हैं (ब्रह्म में, परमात्मा में) और शाखाएँ नीचे फैली हुई हैं (इस भौतिक संसार में)। यह पीपल का पेड़ (अश्वत्थ) कहा गया है।

इसे ऐसे समझो — जब हम नदी के किनारे खड़े होते हैं तो पेड़ का प्रतिबिंब पानी में उलटा दिखाई देता है — जड़ें ऊपर, शाखाएँ नीचे। यह संसार भी वैसा ही है — असली सत्ता (जड़) ऊपर है, और जो हम देखते हैं वह प्रतिबिंब है।

वेदों के मंत्र इस पेड़ के पत्ते हैं — जैसे पत्ते पेड़ को हरा-भरा दिखाते हैं, वैसे ही वेद-मंत्र इस संसार-रूपी पेड़ को विस्तृत करते हैं। और जो इस पूरे पेड़ को — इसकी जड़, शाखाओं और पत्तों सहित — जान लेता है, वही सच्चा वेद-ज्ञानी है।

यह श्लोक गीता के पंद्रहवें अध्याय पुरुषोत्तमयोग का पहला श्लोक है। इस अध्याय को गीता का सार माना जाता रहा है। अश्वत्थ वृक्ष की उपमा कठोपनिषद् (2.3.1) में भी मिलती है।

परंपरा में पीपल के पेड़ को बहुत पवित्र माना जाता रहा है। गीता में भगवान कृष्ण स्वयं कहते हैं (10.26) — वृक्षों में मैं पीपल हूँ।

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