भगवान कहते हैं — हे भरतश्रेष्ठ, जब रजोगुण बढ़ता है तब लोभ, प्रवृत्ति (कुछ करने की तीव्र इच्छा), नए-नए कामों की शुरुआत, बेचैनी और लालसा — ये सब उत्पन्न होते हैं।
इसे ऐसे समझो — जब मन में बहुत सारी योजनाएँ बनती हैं, एक काम पूरा होने से पहले दूसरा शुरू कर देते हैं, "मुझे और चाहिए" की भावना बार-बार आती है, और शांत बैठना मुश्किल लगता है — तो यह रजोगुण की वृद्धि है।
रजोगुण से भरा व्यक्ति बहुत सक्रिय तो होता है, पर उसके मन में सन्तोष नहीं होता। वह हमेशा कुछ-न-कुछ पाने की दौड़ में रहता है।