📿 श्लोक संग्रह

ऋषिभिर्बहुधा गीतम्

गीता 13.5 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 13 — क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग
ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक् ।
ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः ॥
ऋषिभिः
ऋषियों द्वारा
बहुधा
अनेक प्रकार से
गीतम्
गाया गया
छन्दोभिः
वेद मंत्रों में
विविधैः
अनेक प्रकार के
पृथक्
अलग-अलग
ब्रह्मसूत्रपदैः
ब्रह्मसूत्र के पदों में
और
एव
भी
हेतुमद्भिः
युक्तियुक्त
विनिश्चितैः
निश्चित रूप से कहे गए

कृष्ण यहाँ यह बताते हैं कि जो ज्ञान वे देने वाले हैं, वह नया नहीं है। इसे पहले ऋषियों ने अनेक प्रकार से गाया है। अलग-अलग वेद मंत्रों में यह बात कही गई है। और ब्रह्मसूत्र के तर्कपूर्ण पदों में भी यही निश्चित किया गया है।

यह बात मन को आश्वस्त करती है। जैसे दादी कहे — 'यह बात सदा से चली आ रही है, हमारे पुरखे भी यही कहते थे' — वैसे कृष्ण भी कह रहे हैं कि यह ज्ञान बहुत पुराना और परखा हुआ है।

भगवद्गीता के इस श्लोक में ब्रह्मसूत्र का उल्लेख है जो वेदांत की तर्कपूर्ण व्याख्या है। परंपरा में भगवद्गीता, उपनिषद और ब्रह्मसूत्र — इन तीनों को मिलाकर 'प्रस्थानत्रयी' कहते हैं।

गीता प्रेस पाठ में यह पाँचवाँ श्लोक है। यह श्लोक यह स्थापित करता है कि आगे का वर्णन किसी एक व्यक्ति की कल्पना नहीं, बल्कि परंपरा का सार है।

अध्याय 13 · 5 / 34
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