📿 श्लोक संग्रह

यथा प्रकाशयत्येकः

गीता 13.33 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 13 — क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग
यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः ।
क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत ॥
यथा
जैसे
प्रकाशयति
प्रकाशित करता है
एकः
एक
कृत्स्नम्
संपूर्ण
लोकम्
जगत को
इमम्
इस
रविः
सूर्य
क्षेत्रम्
क्षेत्र (शरीर) को
क्षेत्री
क्षेत्री (क्षेत्रज्ञ, आत्मा)
तथा
वैसे ही
कृत्स्नम्
संपूर्ण
प्रकाशयति
प्रकाशित करता है
भारत
हे भरतवंशी

यह अध्याय की सबसे सुंदर उपमा है। जैसे एक सूर्य इस पूरे जगत को प्रकाशित करता है — वैसे ही एक क्षेत्री — आत्मा — इस पूरे शरीर-रूपी क्षेत्र को प्रकाशित करती है।

सूर्य दूर होते हुए भी सबको रोशन करता है। वह खुद किसी चीज़ से रंगता नहीं। उसी तरह आत्मा सब इन्द्रियों को, मन को, बुद्धि को जगाती है — पर खुद अलिप्त रहती है।

सूर्य की यह उपमा कठोपनिषद (2.2.15) में भी आती है — 'न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकम्' — वहाँ न सूर्य चमकता है, यानी ब्रह्म का प्रकाश सूर्य से भी परे है। यहाँ उलटी उपमा है — सूर्य की तरह आत्मा क्षेत्र को प्रकाशित करती है।

गीता प्रेस पाठ में यह तैंतीसवाँ श्लोक है। अगला और अंतिम श्लोक (13.34) इस पूरे अध्याय का समापन करता है।

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