यह श्लोक एक बहुत सुंदर उपमा देता है। आकाश सब जगह है — धूल-मिट्टी में भी, कीचड़ में भी, सुगंध में भी — पर आकाश खुद लिप्त नहीं होता। वह शुद्ध रहता है।
ठीक उसी तरह आत्मा इस देह में सब जगह व्याप्त है — पर देह के कर्मों से, सुख-दुःख से, लिप्त नहीं होती। आत्मा की यह अलिप्तता समझ में आ जाए तो बहुत बोझ हल्का हो जाता है।