📿 श्लोक संग्रह

अनादित्वान्निर्गुणत्वात्

गीता 13.31 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 13 — क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग
अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः ।
शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते ॥
अनादित्वात्
अनादि होने के कारण
निर्गुणत्वात्
निर्गुण होने के कारण
परमात्मा
परमात्मा
अयम्
यह
अव्ययः
अविनाशी
शरीरस्थः
शरीर में स्थित
अपि
होने पर भी
कौन्तेय
हे कुन्तीपुत्र
न करोति
न करता है
न लिप्यते
न लिप्त होता है

यह परमात्मा अनादि है — इसका कोई आरंभ नहीं। निर्गुण है — तीनों गुणों से परे है। अव्यय है — कभी नष्ट नहीं होता। और यह शरीर में रहते हुए भी न कुछ करता है, न किसी कर्म से लिप्त होता है।

जैसे कमल का फूल पानी में रहता है पर भीगता नहीं — उसी तरह परमात्मा देह में रहते हुए भी देह के कर्मों से, संसार की गंदगी से, अछूता रहता है।

यह श्लोक आत्मा की अकर्तृता और अलिप्तता का सारांश है। 'न करोति न लिप्यते' — न करता, न लिप्त होता — यह दो पद गीता का एक मूल विचार हैं।

गीता प्रेस पाठ में यह इकतीसवाँ श्लोक है। इसके बाद दो उपमाएँ आती हैं जो इस अलिप्तता को और स्पष्ट करती हैं।

अध्याय 13 · 31 / 34
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