📿 श्लोक संग्रह

यावत्सञ्जायते किञ्चित्

गीता 13.27 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 13 — क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग
यावत्सञ्जायते किञ्चित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम् ।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ ॥
यावत्
जो भी
सञ्जायते
जन्म लेता है
किञ्चित्
कुछ भी
सत्त्वम्
प्राणी
स्थावर
स्थिर (पेड़-पत्थर)
जङ्गमम्
चलने वाला
क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्
क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के संयोग से
तत्
उसे
विद्धि
जानो
भरतर्षभ
हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ (अर्जुन)

कृष्ण एक सुंदर निष्कर्ष देते हैं। इस सृष्टि में जो भी जन्म लेता है — चाहे पेड़-पहाड़ हो, चाहे पशु-पक्षी, चाहे मनुष्य — वह सब क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के संयोग से है।

शरीर — क्षेत्र — और उसमें रहने वाली चेतना — क्षेत्रज्ञ — इन दोनों के मिलन से ही कोई भी प्राणी बनता है। यह भेद देखने वाले की आँख खुल जाती है।

यह श्लोक पूरे अध्याय के केंद्रीय विचार का सरल सार है। जो जन्म लेता है वह संयोग है — न शरीर अकेला सब कुछ है, न आत्मा अकेली। दोनों का संयोग ही प्राणी है।

गीता प्रेस पाठ में यह सत्ताईसवाँ श्लोक है। अगला श्लोक 13.28 पहले से वेबसाइट पर उपलब्ध है।

अध्याय 13 · 27 / 34
अध्याय 13 · 27 / 34 अगला →