📿 श्लोक संग्रह

अविभक्तं च भूतेषु

गीता 13.17 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 13 — क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग
अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम् ।
भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च ॥
अविभक्तम्
अविभक्त (अखंड)
और
भूतेषु
प्राणियों में
विभक्तम्
विभक्त (बँटा हुआ)
इव
जैसे
स्थितम्
स्थित है
भूतभर्तृ
प्राणियों का धारण करने वाला
तत्
वह
ज्ञेयम्
जानने योग्य
ग्रसिष्णु
संहार करने वाला
प्रभविष्णु
उत्पन्न करने वाला

ब्रह्म एक और अखंड है — पर प्राणियों में जैसे बँटा हुआ दिखता है। जैसे एक चाँद की परछाईं हज़ारों तालाबों में दिखे — चाँद एक ही है, पर प्रतिबिंब अलग-अलग दिखते हैं।

वह प्राणियों को धारण करने वाला है, उनका पालक है। और वही संहार करने वाला भी है, और उत्पन्न करने वाला भी। सृष्टि, पालन और संहार — तीनों उसी से हैं।

यह श्लोक त्रिमूर्ति की अवधारणा से जुड़ता है — ब्रह्मा (सृष्टि), विष्णु (पालन), महेश (संहार) — पर यहाँ तीनों कार्य एक ही ब्रह्म के बताए गए हैं।

गीता प्रेस पाठ में यह सत्रहवाँ श्लोक है। 'विभक्तम् इव' — जैसे बँटा हुआ — का 'इव' (जैसे) पद महत्वपूर्ण है। वह वास्तव में बँटता नहीं, केवल बँटा हुआ जान पड़ता है।

अध्याय 13 · 17 / 34
अध्याय 13 · 17 / 34 अगला →